Tuesday, 28 January 2014

मिलने की आस



रसरंगीन शमा हो जाता है 
 जब याद किसी की आती है । 

 पलकों पर अश्रुकण के बौछार उतर आते हैं 
 आशा के दीप लिए मन डोला सा लगता है । 

न जाने हर्षित ये दिल कब होगा 
हर पल शोला ये उगलता है। 

 नींद नयन छोड़ कर भागे 
हर पल उसी की याद सतावे । 

मुद्दत कब अपना चमत्कार दिखलाएगी 
 जब उनसे हमारी मुलाकात करवाएगी । 

उनके दिल की  दीवारों पर नाम होगा मेरा 
न जाने  कब होगा ऐसा सवेरा । 

न जाने  कब होगा ऐसा सवेरा
जब वो आयेंगे  और हमें पास बुलायेंगे 
मुझे वहाँ ले जायेंगे जहाँ होगा बस हम दोनों का बसेरा 
 न जाने  कब होगा ऐसा सवेरा । 

 न जाने  कब होगा ऐसा सवेरा 
जब तनहा दिल को मंजिल मिल जायेगी
और चारों ओर होगा बस प्रेम का बसेरा 
न जाने  कब होगा ऐसा सवेरा । 
                                                               ---shilchan

poem ref: Milne Ki Aas...






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