रसरंगीन शमा हो जाता है
जब याद किसी की आती है ।
पलकों पर अश्रुकण के बौछार उतर आते हैं
आशा के दीप लिए मन डोला सा लगता है ।
न जाने हर्षित ये दिल कब होगा
हर पल शोला ये उगलता है।
नींद नयन छोड़ कर भागे
हर पल उसी की याद सतावे ।
मुद्दत कब अपना चमत्कार दिखलाएगी
जब उनसे हमारी मुलाकात करवाएगी ।
उनके दिल की दीवारों पर नाम होगा मेरा
न जाने कब होगा ऐसा सवेरा ।
न जाने कब होगा ऐसा सवेरा
जब वो आयेंगे और हमें पास बुलायेंगे
मुझे वहाँ ले जायेंगे जहाँ होगा बस हम दोनों का बसेरा
न जाने कब होगा ऐसा सवेरा ।
न जाने कब होगा ऐसा सवेरा
जब तनहा दिल को मंजिल मिल जायेगी
और चारों ओर होगा बस प्रेम का बसेरा
न जाने कब होगा ऐसा सवेरा ।

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